वीर सिरोमणि राव सुरताण देवड़ा: स्वाधीनता के अमर प्रतीक और सिरोही की स्वर्णिम शौर्यगाथा

भूमिका: आबू की पावन धरा और स्वाभिमान का सूर्य
भारतीय इतिहास का पन्ना-पन्ना वीरों की गाथाओं से रंगा पड़ा है। जब-जब विदेशी या आक्रामक शक्तियों ने भारत भूमि को अपनी अधीनता की जंजीरों में जकड़ने का प्रयास किया, तब-तब इस देश के किसी न किसी कोने से स्वाभिमान की ज्वाला धधक उठी। राजस्थान का इतिहास विशेष रूप से ऐसी हुंकार का गवाह रहा है, जहाँ मातृभूमि की रक्षा के लिए सिर कटाना सम्मान की बात मानी जाती थी। जब हम मध्यकालीन भारत में मुगल सम्राट अकबर की विस्तारवादी नीतियों और राजपूत राज्यों के प्रतिरोध की चर्चा करते हैं, तो अक्सर ध्यान मेवाड़ के महाराणा प्रताप या मारवाड़ के राव चंद्रसेन पर केंद्रित हो जाता है। परंतु इसी इतिहास के पन्नों में एक ऐसा महान वीर योद्धा और कूटनीतिज्ञ भी दर्ज है, जिसने अपने राज्य की स्वतंत्रता के लिए अकबर की विशाल मुगल सेना से लगातार ५२ युद्ध लड़े और कभी भी मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की। वह नाम है—महाराव सुरताण सिंह देवड़ा (राव सुरताण)।
सिरोही की दुर्गम पहाड़ियों, आबू पर्वत की वादियों और अरवल्ली की उपत्यकाओं में रचा-बसा यह इतिहास न केवल एक शासक के साहस की कहानी है, बल्कि यह उस अटूट राजपूती परंपरा का दर्पण है जहाँ एक छोटी सी रियासत ने अपने समय की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति के दांत खट्टे कर दिए थे। राव सुरताण का जीवन और उनका ३८ वर्षों का शासनकाल (१५७२ ई. से १६१० ई.) सिरोही राज्य की संप्रभुता को बनाए रखने का एक अविस्मरणीय कालखंड था।
सिरोही का राजवंश और देवड़ा चौहानों का गौरवशाली अतीत
राव सुरताण के जीवन और उनके महान कार्यों को समझने के लिए पहले सिरोही के देवड़ा चौहान राजवंश की पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है।
देवड़ा चौहान वस्तुतः शाकंभरी (सांभर) और अजमेर के चौहानों की ही एक प्रमुख शाखा हैं। १२वीं और १३वीं शताब्दी के दौरान जब भारत में राजनीतिक हलचलें तेज हो रही थीं, तब चौहानों की शाखाओं ने दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं। जालौर के सोनगरा चौहानों से ही आगे चलकर ‘देवड़ा’ शाखा का निकास हुआ। राव देवराज के नाम पर इस शाखा को देवड़ा चौहान कहा गया।
१४वीं शताब्दी की शुरुआत में राव लुंभा (लुंभराज) ने चंद्रावती और आबू क्षेत्र पर अधिकार कर सिरोही के देवड़ा राजवंश की वास्तविक नींव रखी। समय के साथ, जब चंद्रावती पर निरंतर बाहरी आक्रमण होने लगे, तब शासकों ने सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से राजधानी को स्थानांतरित करना उचित समझा।
- शिवपुरी की स्थापना: १४०५ ई. में राव शिवभान (शोभाजी) ने आबू के निकट शिवपुरी नामक नगर बसाया और इसे अपनी राजधानी बनाया।
- सिरोही नगर का निर्माण: इसके पश्चात १४२५ ई. में राव सहसमल (सैंसमल) ने शिवपुरी से थोड़ी दूरी पर एक नया सुरक्षित दुर्ग और नगर स्थापित किया, जिसे ‘सिरोही’ नाम दिया गया।
सिरोही अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सदैव सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रही। यह क्षेत्र मेवाड़, मारवाड़, गुजरात और मालवा के व्यापारिक व सैन्य मार्गों के बीच स्थित था। इसके चारों ओर फैली अरावली की अभेद्य चोटियाँ और घने जंगल इसे एक प्राकृतिक किला प्रदान करते थे। इसी भूगोल और देवड़ा चौहानों के जन्मजात लड़ाकू स्वभाव ने आगे चलकर राव सुरताण को मुगलों के विरुद्ध एक लंबी छापामार और आमने-सामने की जंग लड़ने का प्राकृतिक कवच दिया।

प्रारंभिक जीवन, जन्म एवं राज्यारोहण का संकट
राव सुरताण सिंह का जन्म लगभग १५५८-१५६० ई. के आसपास नांदिया के ठाकुर भाणजी (भान सिंह) के घर हुआ था। वे सिरोही के पूर्व महाराव लाखा के प्रपौत्र थे। बचपन से ही सुरताण अत्यंत मेधावी, अस्त्र-शस्त्र संचालन में निपुण और तीव्र बुद्धि के स्वामी थे।
१५७२ ई. में सिरोही के महाराव मानसिंह द्वितीय की असमय मृत्यु हो गई। राव मानसिंह निसंतान थे और अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने सुरताण को अपना उत्तराधिकारी (गोद लिया पुत्र) घोषित कर दिया था। परंतु सुरताण की आयु उस समय मात्र १२ वर्ष के आसपास थी। बालक सुरताण के सिर पर जैसे ही सिरोही का मुकुट रखा गया, राज्य के आंतरिक षड्यंत्र और दरबारी गुटबाजी उभरकर सामने आ गई।
उत्तराधिकार का संघर्ष (१५७२ ई.)
सिरोही के मुख्य मंत्री बीजा सिंह (बीजा देवड़ा) ने सुरताण की कम आयु का लाभ उठाकर और सत्ता के मोह में पड़कर विद्रोह कर दिया। बीजा सिंह स्वयं गद्दी हथियाना चाहता था। इस आंतरिक कलह के कारण सिरोही में लगभग आठ महीने तक अस्थिरता का माहौल रहा। बीजा ने छिपे तौर पर पड़ोसी राज्यों और मुगलों के स्थानीय प्रतिनिधियों से भी सांठगांठ करने का प्रयास किया।
परंतु सिरोही के स्वामीभक्त सरदारों और देवड़ा राजपूतों को यह स्वाभिमान-विरोधी कृत्य स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने बीजा के षड्यंत्रों को निष्फल करते हुए बालक सुरताण का डटकर साथ दिया। अंततः बीजा सिंह को राज्य छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा और १५७२ ई. के अंत तक राव सुरताण का सिरोही के महाराव के रूप में सिंहासन निष्कंटक रूप से स्थापित हो गया।
गद्दी पर बैठते ही सुरताण को समझ आ गया कि उनका जीवन सुख-सुविधाओं के भोग के लिए नहीं, बल्कि मातृभूमि की संप्रभुता को बचाने की एक अखंड तपस्या के लिए हुआ है।
मुगलों से संघर्ष का पृष्ठभूमि: अकबर की राजपूत नीति और सुरताण की हुंकार
१६वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुगल सम्राट अकबर अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के चरम पर था। अकबर ने उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों को अपनी अधीनता स्वीकार कराने के लिए वैवाहिक संबंधों, मनसबदारी व्यवस्था और सैन्य बल का एक मिला-जुला चक्रव्यूह रचा था। जयपुर (आमेर), बीकानेर और मारवाड़ के कई राजकुमार व राजा मुगलों के मनसबदार बन चुके थे।
परंतु कुछ ऐसे सूर्यपुत्र भी थे जो अकबर की इस नीति के आगे झुकने को तैयार नहीं थे:
१. मेवाड़ में महाराणा प्रताप
२. मारवाड़ में राव चंद्रसेन
३. सिरोही में राव सुरताण देवड़ा
अकबर जानता था कि गुजरात विजय और मेवाड़ पर पूर्ण नियंत्रण के लिए सिरोही पर अधिकार करना अत्यंत आवश्यक है। मालवा और गुजरात जाने वाले प्रमुख सैन्य व व्यापारिक मार्ग सिरोही के भूभाग से होकर गुजरते थे। यदि सिरोही स्वतंत्र रहता, तो मुगलों की रसद और गुजरात जाने वाली सेनाओं पर हमेशा संकट मंडराता रहता।
अकबर ने शुरुआत में राव सुरताण को संधि का प्रस्ताव भेजा और मनसब व जागीर का लालच दिया। परंतु राव सुरताण ने अकबर के इस प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया। सुरताण का स्पष्ट मानना था कि देवड़ा चौहानों की भूमि पर केवल और केवल स्वतंत्रता का ध्वज फहराएगा। इस इनकार ने अकबर को क्रुद्ध कर दिया और इसके बाद शुरू हुआ मुगलों और सिरोही के बीच एक ऐतिहासिक, दीर्घकालिक और रक्तरंजित संघर्ष।
प्रारंभिक मुगल आक्रमण और गुरिल्ला युद्ध (१५७२–१५७७ ई.)
अकबर ने सिरोही को कुचलने के लिए अपने शक्तिशाली सेनापतियों को भेजा। १५७६-१५७७ ई. में बीकानेर के राजा रायसिंह और सैयद हाशिम के नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना ने सिरोही पर धावा बोला।
आबू और अचलगढ़ की शरण
मुगल सेना की विशालता और उनके आधुनिक तोपखाने को देखते हुए राव सुरताण ने एक चतुर रणनीतिकार की भांति काम लिया। वे जानते थे कि मैदानी युद्ध में मुगलों का सामना करना अदूरदर्शिता होगी। अतः उन्होंने सिरोही के मैदानी हिस्सों को खाली कर दिया और अपनी सेना के साथ आबू पर्वत तथा अचलगढ़ के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में मोर्चा संभाल लिया।
मुगलों ने सिरोही नगर पर कब्जा कर लिया, लेकिन आबू की पहाड़ियों में छिपे सुरताण पर नियंत्रण पाना उनके लिए असंभव साबित हो रहा था। सुरताण के सैनिक पहाड़ियों से निकलकर रात के अंधेरे में मुगल शिविरों पर अचानक हमला करते, उनकी रसद सामग्री लूट लेते और पुनः जंगलों में गायब हो जाते। इस छापामार (गुरिल्ला) युद्ध नीति ने मुगल सेना के हौसले तोड़ दिए।
हालाँकि परिस्थितियों की नजाकत को देखते हुए सुरताण ने समय बिताने की कूटनीति के तहत मुगलों से एक अस्थायी संधि की और कुछ समय के लिए दिखावटी अधीनता का नाटक किया। परंतु जैसे ही मुगल सेनापति मुख्य सेना के साथ वापस लौटे, राव सुरताण ने पुनः अपनी स्वाधीनता की घोषणा कर दी और मुगल चौकियों को खदेड़ बाहर किया।
ऐतिहासिक ‘दत्ताणी का युद्ध’ (१५८३ ई.): वीरता की पराकाष्ठा
सिरोही के इतिहास और राव सुरताण के जीवन का सबसे गौरवशाली और महत्वपूर्ण क्षण १५८३ ई. में आया, जब ‘दत्ताणी का युद्ध’ (Battle of Dattani) लड़ा गया। यह युद्ध केवल दो सेनाओं की भिड़ंत नहीं थी, बल्कि स्वाभिमान और गद्दारी तथा स्वतंत्रता और imperial अहंकार के बीच का महासंग्राम था।
युद्ध के कारण और पृष्ठभूमि
१५८३ ई. में अकबर ने सिरोही को पूर्ण रूप से नष्ट करने और सुरताण का नामोनिशान मिटाने का अंतिम निर्णय लिया। इस बार अकबर ने एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला। उसने मेवाड़ के महाराणा प्रताप के विद्रोही और छोटे भाई जगमाल सिसोदिया को सिरोही का आधा राज्य देने का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। जगमाल मुगलों की शरण में जा चुका था और अकबर ने उसे सिरोही का परगना देने का फरमान जारी कर दिया।
अकबर ने जगमाल की सहायता के लिए एक बहुत बड़ी और सुसज्जित मुगल-राजपूत संयुक्त सेना भेजी। इस सेना का नेतृत्व:
- जगमाल सिसोदिया (मेवाड़ का भगोड़ा राजकुमार)
- राव रायसिंह (मारवाड़ के राव चंद्रसेन का तीसरा पुत्र)
- कोली सिंह दातीवाड़ा
- और कई अन्य मुगल मनसबदार कर रहे थे।
इस संयुक्त मुगल सेना में लगभग ५,००० से अधिक घुड़सवार, तोपखाना और भारी पैदल सेना शामिल थी। दूसरी ओर, राव सुरताण के पास केवल अपने मुट्ठी भर निष्ठावान देवड़ा राजपूत योद्धा, भील तीरंदाज और स्थानीय पहाड़ी सैनिक थे।
युद्ध का मैदान: दत्ताणी
१७ अक्टूबर १५८३ ई. को सिरोही के पास स्थित दत्ताणी नामक स्थान के मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हुईं।
राव सुरताण ने अपनी रणनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए मुगल सेना को ऐसे संकरे क्षेत्र में खींच लिया जहाँ उनका तोपखाना और विशाल घुड़सवार दस्ता बेअसर हो गया। जब युद्ध प्रारंभ हुआ, तो देवड़ा वीरों ने “हर-हर महादेव” और “अर्बुदनाथ की जय” के गगनभेदी जयघोष के साथ मुगल सेना पर काल बनकर धावा बोल दिया।
सुरताण का प्रचंड तांडव और समरा देवड़ा का बलिदान
दत्ताणी के मैदान में हुआ यह युद्ध अत्यंत भयानक और रोंगटे खड़े कर देने वाला था। सुरताण के राजपूत वीरों ने अपनी जान की परवाह किए बिना मुगल पंक्तियों को छिन्न-भिन्न करना शुरू कर दिया।
इस युद्ध में सिरोही के अमर सेनापति समरा देवड़ा ने जो शौर्य दिखाया, उसकी मिसाल इतिहास में दुर्लभ है। समरा देवड़ा ने मुगल सेनापति के दस्ते को अकेले ही पीछे धकेल दिया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।
राव सुरताण स्वयं अपनी नंगी तलवार लेकर युद्ध के मैदान में मुगलों पर टूट पड़े। उन्होंने आगे बढ़कर मुगलों के मुख्य स्तंभों पर हमला किया:
- युद्ध के दौरान राव सुरताण के हाथों या उनके वीरों के प्रहार से अकबर का चहेता जगमाल सिसोदिया मार गिराया गया।
- मुगलों का साथ दे रहे राव रायसिंह भी इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
- कोली सिंह दातीवाड़ा भी मैदान में मारा गया।
युद्ध का परिणाम
तीन प्रमुख सेनापतियों की मृत्यु से मुगल सेना में भगदड़ मच गई। जो मुगल सेना सिरोही को जीतने आई थी, वह अपनी जान बचाकर भागने पर मजबूर हो गई। राव सुरताण और सिरोही की सेना की इस ऐतिहासिक और निर्णायक विजय ने मुगलों के अहंकार को पूरी तरह चूर-चूर कर दिया।
दत्ताणी के युद्ध ने यह साबित कर दिया कि यदि हौसले बुलंद हों और मातृभूमि के प्रति सच्चा समर्पण हो, तो छोटी से छोटी रियासत भी दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकती है। इस विजय ने सिरोही की व्यावहारिक स्वतंत्रता (de facto independence) पर हमेशा के लिए मुहर लगा दी।
५२ युद्धों का नायक: मुगलों के खिलाफ निरंतर संघर्ष (१५८३-१६१० ई.)
दत्ताणी की हार अकबर के लिए एक गहरा सदमा थी। एक सम्राट जिसके आगे भारत के बड़े-बड़े राजा मस्तक झुका चुके थे, उसे आबू के जंगलों के एक राजा ने पराजित कर दिया था। अकबर ने इसके बाद भी सिरोही पर नियंत्रण पाने के लिए कई प्रयास किए, परंतु राव सुरताण की रणनीति हर बार मुगलों पर भारी पड़ी।
ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय ख्यात साहित्य के अनुसार, राव सुरताण ने अपने ३८ वर्षों के शासनकाल में कुल ५२ युद्ध लड़े!
इन ५२ युद्धों में से अधिकांश युद्ध मुगलों की आक्रामक नीतियों, स्थानीय बागी सामंतों और पड़ोसी मुगलभक्त राज्यों के अतिक्रमण के विरुद्ध लड़े गए थे। सुरताण की युद्ध नीति के प्रमुख स्तंभ थे:
१. पहाड़ी सामरिक स्थिति का लाभ: जब भी मुगल भारी सेना भेजते, सुरताण आबू की पहाड़ियों और अचलगढ़ के किले को अपना केंद्र बना लेते।
२. स्थानीय जनजातियों का सहयोग: सिरोही के गरासिया और भील समुदाय राव सुरताण के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। उनके धनुर्धारी सैनिक मुगलों के रसद मार्गों को काटने में माहिर थे।
३. त्वरित आक्रमण और वापसी: सुरताण कभी भी दुश्मन को संभलने का मौका नहीं देते थे। वे अचानक हमला करते और मुगलों के पैर उखाड़ देते।
अकबर अपनी मृत्यु (१६०५ ई.) तक सिरोही को पूर्णतः अपना गुलाम नहीं बना सका। राव सुरताण का यह संघर्ष इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी स्वाधीनता से समझौता करने को तैयार नहीं थे।

महान देशभक्तों के आश्रयदाता: कूटनीतिक एवं अंतर-राज्यीय संबंध
राव सुरताण केवल एक निर्भीक योद्धा ही नहीं थे, बल्कि एक उच्च कोटि के कूटनीतिज्ञ और राजपूती सिद्धांतों के कट्टर समर्थक भी थे। उन्होंने संकट के समय अन्य स्वाभिमानी राजपूत राजाओं और राजकुमारों की खुलकर सहायता की।
१. मारवाड़ के राव चंद्रसेन को संरक्षण
जब मारवाड़ के महान स्वतंत्रता सेनानी राव चंद्रसेन (जिन्हें ‘मारवाड़ का प्रताप’ कहा जाता है) मुगलों से लगातार संघर्ष कर रहे थे और उनके पास रहने का कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचा था, तब राव सुरताण ने मुगलों के गुस्से की परवाह किए बिना राव चंद्रसेन को दो वर्षों तक सिरोही में सुरक्षित शरण दी।
२. मेवाड़ (महाराणा प्रताप और अमर सिंह) से प्रगाढ़ संबंध
राव सुरताण के मेवाड़ के महाराणा प्रताप और उनके पुत्र महाराणा अमर सिंह प्रथम के साथ अत्यंत मधुर और भ्रातृवत संबंध थे। यद्यपि दत्ताणी के युद्ध में महाराणा प्रताप के विद्रोही भाई जगमाल को सुरताण की सेना ने मारा था, लेकिन महाराणा प्रताप स्वयं जगमाल के इस राष्ट्रद्रोही रवैये से दुखी थे। मेवाड़ और सिरोही दोनों ने मुगलों के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बना रखा था। बाद में सुरताण की पुत्री (रानी जेत कुँवर) का विवाह मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह से हुआ, जिसने इन संबंधों को और मजबूत किया।
३. मारवाड़ के शिशु राजकुमार अजीत सिंह की रक्षा (कालंद्री प्रसंग)
राव सुरताण की मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा स्थापित परंपरा जारी रही, परंतु उनके जीवनकाल में ही देवड़ा घराने का मारवाड़ के प्रति वफादारी का इतिहास गढ़ा गया। जब बाद में औरंगजेब के समय वीर दुर्गादास राठौड़ मारवाड़ के शिशु राजकुमार अजीत सिंह को मुगलों के चंगुल से बचाकर लाए थे, तब अजीत सिंह को छिपाने के लिए सिरोही के कालंद्री गाँव को ही चुना गया था। सिरोही के जयदेव पुरोहित और देवड़ा राजपूतों ने अपनी जान पर खेलकर मारवाड़ के भावी महाराजा का पालन-पोषण किया। इस परंपरा की नीव राव सुरताण के स्वाभिमानी सिद्धांतों पर ही टिकी थी।
प्रशासनिक कुशलता, स्थापत्य एवं जनकल्याणकारी कार्य
राव सुरताण का पूरा जीवन यद्यपि युद्धों के धुएँ में बीता, परंतु वे एक दूरदर्शी प्रशासक और प्रजापालक राजा भी थे। उन्होंने सिरोही के आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक उत्थान के लिए कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए:
दुर्गों और सैन्य चौकियों का पुनर्निर्माण
- सुरताण ने सिरोही की सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए शिवपुरी दुर्ग की मरम्मत करवाई और उसकी प्राचीर को मजबूत किया।
- प्राचीन ऐतिहासिक नगरी चंद्रावती के खंडहरों और सामरिक स्थलों को पुनः सुरक्षित किया ताकि मुगलों के अचानक आक्रमण को रोका जा सके।
जल संरक्षण एवं कृषि सुधार
राजस्थान की शुष्क जलवायु को देखते हुए सुरताण ने कृषि के विकास पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने जवाई (Jawai) और चारा (Chara) नदियों के प्रवाह क्षेत्रों में सिंचाई प्रणालियों और नहरों का जीर्णोद्धार करवाया। इससे सिरोही के किसानों को युद्ध के दौर में भी खाद्यान्न संकट का सामना नहीं करना पड़ा।
धार्मिक एवं पुरातात्विक संरक्षण
राव सुरताण अर्बुद मंडल (आबू) के धार्मिक स्थलों के परम भक्त थे। उन्होंने आबू के प्रसिद्ध अचलेश्वर महादेव, वशिष्ठ आश्रम और जैन मंदिरों की सुरक्षा का पुख्ता प्रबंध किया। उन्होंने चंद्रावती के प्राचीन मध्यकालीन मंदिरों के संरक्षण और पुरातात्विक पुनरुद्धार के लिए आर्थिक अनुदान दिया।
जागीरदारी और सामंती व्यवस्था
अपनी प्रजा और सामंतों को एकजुट रखने के लिए सुरताण ने पारंपरिक सामंती अनुदानों (जागीरों) की पुष्टि की। उन्होंने ब्राह्मणों, चारणों और स्वामीभक्त ठाकुरों को भूमि अनुदान (शासन जागीर) दिए, जिससे राज्य में सामाजिक समरसता बनी रही।
व्यक्तिगत जीवन, परिवार और व्यक्तित्व
राव सुरताण सिंह का व्यक्तित्व एक आदर्श राजपूत नरेश का मेल था। वे एक तरफ युद्ध के मैदान में अत्यंत कठोर और निर्दयी योद्धा थे, तो दूसरी तरफ अपनी प्रजा, विद्वानों और शरणागतों के लिए अत्यंत दयालु थे।
विवाह और संतान
राव सुरताण की १२ रानियाँ थीं। उनकी प्रमुख रानियों में:
१. रानी रायदा कुँवर (पाटोली के ठाकुर आशकरण की पुत्री)
२. रानी माया देवी (जैसलमेर के रावल भोजराज सिंह की पुत्री)
उनके दो पुत्र थे:
- रायसिंह द्वितीय: सुरताण के ज्येष्ठ पुत्र, जिन्हें उनकी मृत्यु के पश्चात सिरोही का उत्तराधिकारी और महाराव बनाया गया।
- सूर सिंह: सुरताण के छोटे पुत्र, जिन्होंने बाद में राज्य के प्रधानमंत्री और सैन्य सलाहकार के रूप में सेवाएं दीं।
इसके अलावा उनकी पुत्री रानी जेत कुँवर का विवाह मेवाड़ राजघराने में हुआ था।
निधन और अमर विरासत
३८ वर्षों तक मुगलों की विशाल शक्ति से सफलता पूर्वक लोहा लेने, ५२ युद्ध लड़ने और सिरोही की स्वतंत्रता का परचम फहराए रखने के बाद, इस महान योद्धा का १६१० ई. में लगभग ५१-५२ वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार पारंपरिक राजपूत रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया और संपूर्ण सिरोही राज्य में शोक की लहर दौड़ गई।
राव सुरताण की मृत्यु के साथ ही राजपूताना के इतिहास के उस सुनहरे अध्याय का अंत हुआ जिसमें छोटे राज्यों ने बिना किसी बड़े संसाधन के भी मुगलों के सामने अपना मस्तक नहीं झुकाया।
इतिहास में मूल्यांकन: एक विस्मृत नायक की पुनः प्रतिष्ठा
आज जब हम भारतीय इतिहास का निष्पक्ष मूल्यांकन करते हैं, तो राव सुरताण का नाम महाराणा प्रताप और राव चंद्रसेन के समकक्ष खड़ा नजर आता है।
राव सुरताण का ऐतिहासिक योगदान:
१. स्वाधीनता की रक्षा: अकबर जैसे महान मुगल सम्राट के शासनकाल में जब भारत के बड़े-बड़े राजवंश मुगलों के सामने नतमस्तक हो चुके थे, तब सुरताण ने सिरोही को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में जीवित रखा।
२. दत्ताणी युद्ध का महत्व: दत्ताणी का युद्ध (१५८३ ई.) भारतीय इतिहास के उन गिने-चुने युद्धों में से एक है जहाँ एक छोटी सी क्षेत्रीय सेना ने शाही मुगल सेना को निर्णायक रूप से परास्त किया और उनके प्रमुख सेनापतियों को मार गिराया।
३. शरणार्थियों के रक्षक: उन्होंने अपने राज्य को मुगलों के विरोधी वीरों (जैसे राव चंद्रसेन) के लिए एक सुरक्षित शरणगाह बनाया।
लोकगीतों, चारणी साहित्य और स्थानीय कविताओं में राव सुरताण की वीरता की गाथाएँ आज भी सिरोही और आबू के घर-घर में गाई जाती हैं। राजस्थानी साहित्य में एक प्रसिद्ध उक्ति देवड़ा वीरों और सुरताण के स्वाभिमान को दर्शाती है कि “देवड़ा अपनी भूमि की एक इंच माटी भी किसी विदेशी आक्रांता को बिना युद्ध के नहीं देते।”
निष्कर्ष
वीर शिरोमणि राव सुरताण देवड़ा केवल सिरोही के राजा नहीं थे; वे भारतीय आत्मा के उस अविनाशी स्वाभिमान के प्रतीक थे जो किसी भी परिस्थिति में दास्तां स्वीकार नहीं करता। उन्होंने अपने ३८ वर्ष के शासन में यह सिद्ध कर दिया कि राज्य का आकार या सेना की संख्या इतनी महत्वपूर्ण नहीं होती जितना कि राजा और उसकी प्रजा का अटूट साहस और अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम।
सिरोही की अरावली पहाड़ियों, अचलगढ़ के पत्थरों और दत्ताणी के ऐतिहासिक मैदानों में आज भी राव सुरताण और उनके वीर साथियों के शौर्य की गूंज सुनाई देती है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति, स्वाभिमान, साहस और कुशल नेतृत्व का एक अमर संदेश प्रस्तुत करता रहेगा।