सिरोही री धरती रो फलो फूलो राजवी – मानसिंह देवड़ा

राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) की वीर प्रसूता भूमि पर कई पराक्रमी राजवंशों ने जन्म लिया, जिन्होंने अपने रक्त से स्वाभिमान और स्वतंत्रता की अमिट इबारत लिखी। इन्हीं में से एक प्रतापी राजवंश था—सिरोही के देवड़ा चौहान।
जब हम सिरोही के देवड़ा राजवंश के इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो राव मानसिंह देवड़ा द्वितीय (Rao Man Singh Deora II) का नाम एक अत्यंत पराक्रमी, दूरदर्शी और कलाप्रेमी शासक के रूप में उभरकर सामने आता है। उन्होंने १६वीं शताब्दी (१५६०-१५७२ ईस्वी के आसपास) में सिरोही रियासत की बागडोर संभाली। उनका शासनकाल न केवल मुगलों और पड़ोसी राज्यों के साथ राजनीतिक संघर्षों के लिए जाना जाता है, बल्कि सिरोही की विश्वप्रसिद्ध ‘मानशाही तलवारों’ के आविष्कार और ऐतिहासिक उत्तराधिकार के अनूठे फैसलों के लिए भी अमर है।
१. देवड़ा राजवंश और सिरोही की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सिरोही पर शासन करने वाले देवड़ा राजपूत, मूल रूप से नाडोल और जालोर के चौहानों की एक प्रतापी उपशाखा हैं। जालोर के प्रसिद्ध शासक समरसिंह के पुत्र राव देवराज ने इस शाखा की नींव रखी थी, जिसके कारण उनके वंशज ‘देवड़ा’ कहलाए।
- स्थापना: वर्ष १३११ ईस्वी में राव लुम्भा ने परमार शासकों को पराजित कर आबू और चंद्रावती पर अधिकार किया।
- राजधानी परिवर्तन: आगे चलकर १४२५ ईस्वी में राव सहसमल (Sains Mal) ने वर्तमान सिरोही शहर की स्थापना की और इसे अपनी राजधानी बनाया।
राव मानसिंह देवड़ा इसी तेजस्वी वंश परंपरा के एक मजबूत स्तंभ थे, जिन्होंने एक ऐसे संक्रमण काल में सत्ता संभाली जब दिल्ली के तख्त पर मुगल सम्राट अकबर अपनी साम्राज्यवादी नीतियों का विस्तार कर रहा था।
२. राव मानसिंह देवड़ा का प्रारंभिक जीवन और राज्यारोहण
राव मानसिंह देवड़ा का व्यक्तित्व बचपन से ही साहसी और कुशाग्र था। जब वे सिरोही के सिंहासन पर आसीन हुए, तब उनके सामने आंतरिक विद्रोहों को दबाने और बाहरी आक्रमणों से अपनी छोटी लेकिन सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण रियासत की रक्षा करने की दोहरी चुनौती थी।
सिरोही भौगोलिक रूप से अरावली की दुर्गम पहाड़ियों (अर्बुदांचल) से घिरा हुआ था। यह क्षेत्र गुजरात, मालवा और राजपूताना के बीच व्यापारिक और सैन्य मार्ग का मुख्य केंद्र था। इसी कारण मेवाड़, मारवाड़ (जोधपुर) और दिल्ली के सुल्तानों व मुगलों की नजरें हमेशा सिरोही पर टिकी रहती थीं। मानसिंह ने अपनी सैन्य कुशलता और कूटनीति के बल पर सिरोही की संप्रभुता को बनाए रखा।
३. कला और युद्ध कौशल का अनूठा संगम: ‘मानशाही तलवार’ का आविष्कार
राव मानसिंह देवड़ा केवल एक कुशल रणनीतिकार ही नहीं थे, बल्कि उन्हें धातुकला और अस्त्र-शस्त्रों की गहरी समझ थी। इतिहास में उनका नाम एक विशेष आविष्कार के लिए हमेशा आदर के साथ लिया जाता है—मानशाही तलवारें।
तलवारों का इतिहास: मानसिंह के शासनकाल से पहले, राजपूताना में अधिकांश तलवारें सामान्य या कच्चे लोहे से बनाई जाती थीं, जो युद्ध के दौरान भारी आघात लगने पर कभी-कभी मुड़ जाती थीं या टूट जाती थीं।
मानसिंह देवड़ा ने बाहरी देशों और स्थानीय लुहारों (सिकलीगरों) के सहयोग से फौलाद (Steel) को गलाने और उसे विशेष लचीलापन व धार देने की एक नई तकनीक विकसित की। उनके संरक्षण में सिरोही में जो तलवारें बनीं, वे इतनी मजबूत और पैनी थीं कि एक ही वार में दुश्मन के कवच या ऊंट-घोड़े की गर्दन काट सकती थीं।
- इन तलवारों को राजा के नाम पर ‘मानशाही तलवार’ कहा गया।
- सिरोही की तलवारें इतनी प्रसिद्ध हुईं कि पूरे भारत में ‘सिरोही की तलवार’ वीरता का मुहावरा बन गई। आज भी राजस्थान की संस्कृति में इनका एक विशेष स्थान है।
४. वैवाहिक संबंध और तत्कालीन महानायकों से जुड़ाव
राव मानसिंह देवड़ा ने समकालीन राजपूताना के सबसे शक्तिशाली शासकों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपनी कूटनीतिक स्थिति को सुदृढ़ किया था। मानसिंह देवड़ा के कोई पुत्र नहीं था, लेकिन उनकी दो पुत्रियां (राजकुमारियां) थीं, जिनका विवाह भारत के इतिहास को प्रभावित करने वाले दो महान परिवारों में हुआ:
- मारवाड़ से संबंध: एक राजकुमारी का विवाह मारवाड़ (जोधपुर) के वीर और स्वतंत्रता प्रेमी शासक राव चंद्रसेन (जिन्हें ‘मारवाड़ का प्रताप’ और ‘भूला-बिसरा राजा’ कहा जाता है) के साथ हुआ था।
- मेवाड़ से संबंध: दूसरी राजकुमारी का विवाह मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह के पुत्र और महाराणा प्रताप के भाई जगमाल सिसोदिया के साथ हुआ था।
इन वैवाहिक संबंधों के कारण सिरोही सीधे तौर पर मेवाड़ और मारवाड़ की राजनीति का केंद्र बन गया था। जब मुगलों ने मारवाड़ और मेवाड़ पर दबाव बढ़ाया, तो सिरोही ने परोक्ष रूप से स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की।
५. बालक सुरताण देवड़ा की प्रतिभा को पहचानना और उत्तराधिकार
राव मानसिंह देवड़ा के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और दूरदर्शी निर्णय उनका उत्तराधिकारी चुनना था। चूंकि उनका अपना कोई पुत्र नहीं था, इसलिए राज्य के सामंत और पड़ोसी राजा सिरोही पर गिद्ध दृष्टि जमाए बैठे थे।
इसी दौरान मानसिंह की सेना में सुल्तान (सुरताण देवड़ा) नाम का एक बालक था (जो नान्दिया के भानसिंह का पुत्र और राव लाख के वंश से था)। मात्र १० से १२ वर्ष की अल्पायु में ही सुरताण ने अद्भुत युद्ध कौशल का परिचय दिया।
अकबर से मुठभेड़ की ऐतिहासिक कथा
लोकमान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, राव मानसिंह देवड़ा के काल में जब मुगलों के साथ एक सैन्य झड़प हुई, तब बालक सुरताण ने अदम्य साहस दिखाते हुए अपनी तीरंदाजी से मुगल सेना को पीछे धकेल दिया। इस पराक्रम को देखकर राव मानसिंह देवड़ा अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने भांप लिया कि यही वह वीर बालक है जो उनके बाद मुगलों के सामने सिरोही के स्वाभिमान को झुकने नहीं देगा।
राव मानसिंह देवड़ा ने अपने अंतिम समय में सरदारों और सामंतों को बुलाकर अपनी मंशा साफ कर दी कि उनके बाद सिरोही का अगला महाराव सुरताण देवड़ा ही बनेगा।
६. राव मानसिंह देवड़ा का देवलोकगमन और उनकी अमर छतरी
विक्रम संवत १६२८ (लगभग १५७२ ईस्वी) में राव मानसिंह देवड़ा का निधन हो गया। उनके निधन के बाद, उनकी अंतिम इच्छानुसार सिरोही के सामंतों ने मात्र १२ वर्ष की आयु में महाराव सुरताण देवड़ा का राजतिलक किया। सुरताण देवड़ा ने आगे चलकर अकबर के खिलाफ ऐतिहासिक ‘दत्ताणी का युद्ध’ (१५८३ ईस्वी) जीता और सिरोही के सबसे शक्तिशाली शासक बने।
अचलगढ़ दुर्ग में मानसिंह की छतरी
राव मानसिंह देवड़ा की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए सिरोही (माउंट आबू) के ऐतिहासिक अचलगढ़ दुर्ग में स्थित प्रसिद्ध मंदाकिनी कुंड के पास एक बेहद खूबसूरत और नक्काशीदार छतरी (Smarak) बनाई गई है।
७. ऐतिहासिक विरासत और महत्व
राव मानसिंह देवड़ा का इतिहास हमें यह सिखाता है कि एक छोटे राज्य का शासक भी यदि दूरदर्शी, कलाप्रेमी और स्वाभिमानी हो, तो वह इतिहास में अमर हो सकता है।
| ऐतिहासिक पहलू | विवरण और महत्व |
| सैन्य योगदान | मुगलों की साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ अपनी रियासत की सीमाओं को सुरक्षित रखा। |
| तकनीकी क्रांति | ‘मानशाही फौलादी तलवारों’ का निर्माण शुरू करवाकर सिरोही को पूरे देश में अस्त्र निर्माण का केंद्र बनाया। |
| कूटनीतिक दूरदर्शिता | अपनी पुत्रियों का विवाह मारवाड़ के राव चंद्रसेन और सिसौदिया राजवंश में कर राजपूती एकता को बल दिया। |
| उत्तराधिकार का चयन | वंशवाद से ऊपर उठकर योग्यता को प्राथमिकता दी और वीर सुरताण देवड़ा को गोद लेकर गद्दी सौंपी। |
सिरोही के चौहानों के लोकगीतों (हेला ख्यालों) और भाटों की बहियों में आज भी राव मानसिंह देवड़ा का नाम बड़े आदर के साथ गाया जाता है। उनकी बनाई तलवारों की खनक और अचलगढ़ के पत्थरों पर उकेरी गई उनकी छतरी आज भी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को सिरोही के गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है।
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