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स्वामीभक्ति, स्वाभिमान और संरक्षा की अमर गाथा: कालंद्री (सिरोही) में वीर दुर्गादास राठौड़ का ऐतिहासिक प्रवास

कालंद्री (सिरोही) में वीर दुर्गादास राठौड़

१. प्रस्तावना: मारवाड़ का रक्षक और राजपूती आन का अनूठा प्रतीक

भारतीय इतिहास में ऐसे महान नायकों की गाथाएं स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं, जिन्होंने सत्ता, धन या सिंहासन के मोह से ऊपर उठकर केवल राष्ट्र, धर्म और स्वामीभक्ति के उच्च आदर्शों के लिए अपना संपूर्ण जीवन न्योछावर कर दिया। मारवाड़ के इतिहास में वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ (१६३८ – १७१८ ई.) का नाम एक ऐसे ही महान योद्धा, राष्ट्ररक्षक और सर्वोत्कृष्ट कूटनीतिज्ञ के रूप में सर्वोपरि है।

जब मुगल सम्राट औरंगजेब की साम्राज्यवादी और धर्मांध नीतियों के कारण संपूर्ण मारवाड़ (जोधपुर) पर संकट के काले बादल मंडरा रहे थे, तब वीर दुर्गादास राठौड़ ने जोधपुर रियासत के शिशु उत्तराधिकारी कुंवर अजीत सिंह की प्राण-रक्षा और मारवाड़ की स्वतंत्रता का संकल्प उठाया था।

इस दीर्घकालीन संघर्ष (१६७९ – १७०७ ई.) के दौरान एक ऐसा अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक कालखंड आया, जब दिल्ली के मुगलों की नग्न तलवारों और विशाल सेना से नवजात राजकुमार अजीत सिंह को बचाकर एक अत्यंत सुरक्षित, गुप्त और विश्वस्त स्थान पर रखना अनिवार्य हो गया था। वह पावन एवं सुरक्षित स्थान बना — सिरोही रियासत का ऐतिहासिक गांव कालंद्री

कालंद्री (सिरोही) में वीर दुर्गादास राठौड़ और बालक अजीत सिंह का गुप्त प्रवास केवल एक शरणस्थल का इतिहास नहीं है, बल्कि यह राजपूती भाईचारे, स्वामीभक्ति, जन-सामान्य के त्याग और मातृभूमि की रक्षा के लिए की गई कूटनीतिक व्यूहरचना का एक अभूतपूर्व अध्याय है।

                        [ १६७८: महाराजा जसवंत सिंह का निधन (जमरूद) ]
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                        [ औरंगजेब का षड्यंत्र एवं दिल्ली में घेराबंदी ]
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                        [ १६७९: दिल्ली से बालक अजीत सिंह का ऐतिहासिक निष्क्रमण ]
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 [ कालिंदी / कालंद्री (सिरोही) प्रवास ]                            [ अरावली की पहाड़ियों में छापामार युद्ध ]
(श्रीमंत जयदेव पुरोहित एवं भागेली रानी द्वारा पालन-पोषण)           (वीर दुर्गादास द्वारा मुगलों को चकमा देना)
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                        [ १७०७: मारवाड़ का पुनरुद्धार एवं अजीत सिंह का राज्याभिषेक ]

२. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: दिल्ली की घेराबंदी से कालंद्री आगमन तक

महाराजा जसवंत सिंह का निधन और औरंगजेब की कुटिल नीति

नवंबर १६७८ ई. में अफगानिस्तान के जमरूद (पेशावर) में मारवाड़ के प्रतापी महाराजा जसवंत सिंह (प्रथम) का निधन हो गया। उस समय उनका कोई जीवित पुत्र नहीं था, परंतु उनकी दो रानियां गर्भवती थीं। औरंगजेब ने इस अवसर का अनुचित लाभ उठाते हुए तुरंत जोधपुर को ‘खालसा’ (सीधे मुगल नियंत्रण में) घोषित कर दिया और मुग़ल सूबेदारों को मारवाड़ पर अधिकार करने हेतु भेज दिया।

फरवरी १६७९ ई. में पेशावर से लौटते समय जसवंत सिंह जी की महारानी ने बालक अजीत सिंह को जन्म दिया। औरंगजेब ने अजीत सिंह और रानियों को दिल्ली में ‘नूरगढ़’ हवेली में नजरबंद करवा दिया और शर्त रखी कि यदि बालक को इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाए, तो उसे मारवाड़ का राज्य सौंप दिया जाएगा।

दिल्ली से अभूतपूर्व पलायन (जुलाई १६७९ ई.)

वीर दुर्गादास राठौड़, मुकुंददास खींची और बलूंदा के ठाकुर मोकम सिंह मेड़तिया जैसे निष्ठावान वीरों ने अपनी जान की बाजी लगाकर दिल्ली से शिशु अजीत सिंह को बाहर निकालने की रणनीति बनाई।

  • बलूंदा ठाकुर की बाघेली रानी ने अपने नवजात शिशु का बलिदान देकर अजीत सिंह को मुगलों के घेरे से बाहर निकाला।
  • दुर्गादास और उनके वीर साथियों ने भीषण मुग़ल सेना को तलवारों के बल पर रोके रखा और बालक अजीत सिंह को सुरक्षित रूप से राजपूताना की ओर ले आए।
                       [ १६७९: दिल्ली से ऐतिहासिक पलायन ]
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                       [ बलूंदा (पाली) में अल्पकालिक प्रवास ]
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                  [ सिरोही रियासत के अरावली अंचल की ओर प्रस्थान ]
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               [ कालंद्री (सिरोही): सुरक्षित एवं गुप्त शरणस्थल का चयन ]

३. कालंद्री (सिरोही) का चयन ही क्यों?

मुगल गुप्तचरों और औरंगजेब की सेना का पूरा ध्यान मारवाड़ के मैदानी इलाकों पर था। ऐसे में शिशु अजीत सिंह को किसी ऐसे स्थान पर रखना आवश्यक था जो निम्नलिखित दृष्टि से सर्वथा उपयुक्त हो:

  1. अरावली की सुरक्षात्मक भौगोलिक स्थिति: कालंद्री गांव सिरोही रियासत में अरावली पर्वतमालाओं की गोद में स्थित एक अत्यंत दुर्गम और सुरम्य स्थान था, जहाँ मुग़ल सेना का सीधे पहुँच पाना कठिन था।
  2. सिरोही के देवड़ा महाराव का सहयोग: सिरोही के तत्कालीन देवड़ा राजपूत शासक (महाराव बैरीसाल/छत्रसाल) मारवाड़ के मित्र थे। उन्होंने मुगलों के कोपभंजन की परवाह न करते हुए वीर दुर्गादास को अपने क्षेत्र में पूर्ण सुरक्षा और गुप्त आश्रय देने का निर्भीक वचन दिया।
  3. विश्वस्त स्थानीय जनसमुदाय: कालंद्री में निष्ठावान ब्राह्मण परिवार और स्वामीभक्त जन-समुदाय निवास करता था, जो प्राण देकर भी अपने अतिथि और भावी राजा का रहस्य सुरक्षित रख सकते थे।

४. कालंद्री में निवास और शिशु अजीत सिंह का गुप्त पालन-पोषण

कालंद्री में प्रवास के दौरान वीर दुर्गादास राठौड़ ने अत्यंत सूझबूझ और गोपनीयता का परिचय दिया। यदि मुगलों को बालक अजीत सिंह के जीवित होने या कालंद्री में होने की जरा सी भी भनक लग जाती, तो औरंगजेब अपनी संपूर्ण सैन्य शक्ति कालंद्री पर झोंक देता।

श्री जयदेव पुरोहित का त्यागमय योगदान

कालंद्री के एक अत्यंत धर्मनिष्ठ और विद्वान पुष्करणा/पुरोहित ब्राह्मण श्री जयदेव जी (और उनकी पत्नी) को बालक अजीत सिंह के पालन-पोषण और सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया।

  • पहचान छिपाना: बालक अजीत सिंह को एक साधारण ब्राह्मण बालक के रूप में रखा गया। उन्हें ‘कांन्हा’ या सामान्य ग्रामीण बालक के नाम से पुकारा जाता था।
  • बाघेली रानी का वात्सल्य: बलूंदा की बाघेली रानी, जिन्होंने अपने स्वयं के बालक का त्याग किया था, वे भी कालंद्री में गुप्त रूप से छद्म वेश में रहकर बालक को दुलार और संरक्षण देती रहीं।
  • गुप्तचर व्यवस्था: वीर दुर्गादास ने कालंद्री के चारों ओर जंगलों और अरावली के दर्रों में अपने अत्यंत विश्वस्त घुड़सवारों और भील योद्धाओं का गुप्त जाल बिछा रखा था, जो पल-पल की खबर दुर्गादास तक पहुँचाते थे।

५. वीर दुर्गादास की कूटनीति और अरावली से युद्ध संचालन

जब बालक अजीत सिंह कालंद्री की सुरक्षित छत्रछाया में पल रहे थे, उस समय वीर दुर्गादास राठौड़ चैन से नहीं बैठे। उन्होंने कालंद्री और सिरोही के पर्वतीय अंचलों को अपना रणनीतिक मुख्यालय बनाया।

कूटनीतिक एवं सैन्य मोर्चादुर्गादास राठौड़ द्वारा उठाया गया ऐतिहासिक कदम
छुपकर युद्ध (गनिमी कावा)मुग़ल छावनियों और रसद सामग्री पर अचानक आक्रमण कर मुगलों को मारवाड़ में परेशान करना।
मेवाड़-मारवाड़ गठबंधनमेवाड़ के महाराणा राज सिंह प्रथम से संपर्क कर मुगलों के विरुद्ध एक संयुक्त राजपूत मोर्चा तैयार करना।
शहज़ादे अकबर का विद्रोहऔरंगजेब के पुत्र शहज़ादे मोहम्मद अकबर को ही औरंगजेब के खिलाफ भड़काकर अपनी ओर मिला लेना।
मराठा-राजपूत मैत्रीदक्षिण में छत्रपति संभाजी महाराज से संपर्क स्थापित कर मुग़ल साम्राज्य को दो मोर्चों पर घेरना।
                       [ कालंद्री (सिरोही): केंद्रीय गुप्त कमान ]
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[ मेवाड़ संग गठबंधन ]         [ शहज़ादे अकबर का विद्रोह ]       [ अरावली से छापामार युद्ध ]
(महाराणा राज सिंह का सहयोग)    (औरंगजेब के विरुद्ध रणनीतिक मोड़)  (मुग़ल सेना की रसद श्रृंखला ध्वस्त)

६. कालंद्री प्रवास के प्रमुख ऐतिहासिक एवं लोक-प्रसंग

कालंद्री में वीर दुर्गादास राठौड़ के प्रवास से जुड़े अनेक ऐसे प्रसंग आज भी सिरोही और मारवाड़ की लोक-संस्कृति में अमर हैं, जो उनकी धर्मनिष्ठा, संयम और पराक्रम को दर्शाते हैं:

  1. भाले की नोक पर रोटी सेंकना: लोकगाथाओं में प्रसिद्ध है कि दुर्गादास राठौड़ अपने घोड़े की पीठ पर ही हथियार बाँधे रखते थे। कई बार भोजन का समय न मिलने पर वे भाले की नोक पर बाटी/रोटी सेंककर खा लेते थे और निरंतर यात्रा में रहते थे।
  2. औरंगजेब की पौत्री का संरक्षण: जब औरंगजेब का विद्रोही पुत्र अकबर दक्षिण भारत भाग गया, तो उसने अपनी नन्हीं पुत्री (सैफुन्निसा) और पुत्र (बुलंद अख्तर) को दुर्गादास के संरक्षण में छोड़ दिया। दुर्गादास ने कालंद्री और आसपास के सुरक्षित स्थानों में उन मुस्लिम बच्चों को रखा और उनके लिए एक मुस्लिम मौलवी/काज़ी का प्रबंध करके उन्हें कुरान की शिक्षा दिलवाई। बाद में जब ये बच्चे औरंगजेब को लौटाए गए, तो औरंगजेब दुर्गादास के इस उच्च नैतिक चरित्र और शत्रु की संतान के प्रति सम्मान को देखकर स्तब्ध रह गया था।
  3. कालंद्री का जन-जन बना रक्षक: कालंद्री के ग्रामीणों, किसानों और भील आदिवासियों ने मुग़ल गुप्तचरों की भारी खोजबीन के बाद भी कभी मुंह नहीं खोला। कालंद्री की माटी ने स्वामीभक्ति का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो इतिहास में विरला है।

७. संघर्ष की परिणति: मारवाड़ का पुनरुद्धार (१७०७ ई.)

लगभग सात से आठ वर्षों तक कालंद्री में अत्यंत गोपनीयता के साथ रहने के बाद, जब बालक अजीत सिंह थोड़े बड़े हुए और परिस्थिति अनुकूल हुई, तब उन्हें मेवाड़ और तत्पश्चात मारवाड़ के वीरों के समक्ष प्रकट किया गया।

  • २८ वर्षों का अनवरत संघर्ष: वीर दुर्गादास राठौड़ ने १६७९ से १७०७ ई. तक लगातार २८ वर्षों तक मुगलों से गुरिल्ला (छापामार) युद्ध लड़ा।
  • औरंगजेब की मृत्यु (१७०७ ई.): मार्च १७०७ ई. में अहमदनगर में औरंगजेब की मृत्यु हो गई।
  • अजीत सिंह का राज्याभिषेक: औरंगजेब की मृत्यु के तुरंत बाद वीर दुर्गादास और अजीत सिंह ने मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर) पर आक्रमण कर मुग़ल सूबेदार को खदेड़ दिया और अजीत सिंह का जोधपुर के सिंहासन पर अधिकार स्थापित कराया। दुर्गादास ने महाराजा जसवंत सिंह को दिया अपना वचन पूर्ण किया।

८. कालंद्री का ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान स्वरूप

आज भी सिरोही जिले का कालंद्री गांव इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं और देश भक्तों के लिए एक पावन तीर्थ के समान है।

  • ऐतिहासिक स्मारक एवं स्थान: कालंद्री में वह स्थान, जहाँ जयदेव पुरोहित का घर था और जहाँ बालक अजीत सिंह ने अपना बचपन बिताया, आज भी श्रद्धेय माना जाता है।
  • सिरोही की गौरवगाथा: सिरोही का इतिहास केवल अपनी तलवारों (सिरोही खांडा) के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि वीर दुर्गादास और बालक अजीत सिंह को संकटकाल में शरण देने के ऐतिहासिक गौरव के लिए भी जाना जाता है।
                  [ मारवाड़ रक्षा संकल्प (१६७९ ई.) ]
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            [ कालंद्री (सिरोही) में गुप्त प्रवास एवं संरक्षण ]
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            [ २८ वर्षों का अनवरत गुरिल्ला संघर्ष एवं मुग़ल पराजय ]
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             [ १७०७: जोधपुर का राज्याभिषेक एवं वचन पूर्ति ]
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               [ इतिहास में निष्काम देशभक्ति का अमर प्रतीक ]

९. निष्कर्ष: स्वाभिमान और निष्काम सेवा का अमर संदेश

इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने वीर दुर्गादास राठौड़ के विषय में लिखा था:

“उन्हें न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुगलों की विशाल शक्ति उनके दृढ़ निश्चय को पीछे हटा सकी। वे एक ऐसे वीर थे जिनमें राजपूती साहस और मुग़ल मंत्री जैसी कूटनीति का अद्भुत संगम था।”

कालंद्री (सिरोही) में वीर दुर्गादास राठौड़ का प्रवास केवल एक सामरिक आवश्यकता नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि जब कोई राष्ट्र या संस्कृति अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रही हो, तो दूरदर्शिता, धैर्य और जन-समर्थन के बल पर बड़ी से बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति को भी परास्त किया जा सकता है।

साम्राज्य जीतकर भी स्वयं राजा न बनने और केवल अपने स्वामी के पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर निष्काम भाव से दूर हट जाने का जो उदाहरण वीर दुर्गादास ने प्रस्तुत किया, उसकी नींव कालंद्री के उसी गुप्त प्रवास काल में पड़ी थी। कालंद्री की पावन भूमि वीर दुर्गादास के उस अमर त्याग, त्यागपूर्ण संरक्षा और अतुलनीय स्वामीभक्ति की मूक साक्षी बनकर आज भी भारतीय जनमानस को राष्ट्र-प्रथम का संदेश देती है।

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